Friday, June 11, 2010

हमारा नेता कैसा हो


अभी कुछ दिनों पहले मैंने प्रकाश झा की “राजनीति” देखी..आज की राजनीति की भयावह वास्तविकता को बड़ी बेबाकी और निडरता से प्रदर्शित किया है उन्होंने. फिल्म देखने के बाद एक सवाल बार बार कौंध रहा था मन मे “हमारा नेता कैसा होना चाहिए”.असल मे ये प्रश्न तो आजादी के ५० साल बाद भी एक प्रश्न ही है. कुछ समय पहले गुलज़ार साहब की एक फिल्म आई थी “हू तू तू”..इस फिल्म मे भी उन्होंने ने यही प्रश्न उठाया था..उस फिल्म को देखने के बाद मन मे कुछ उलझने पैदा हुईं..उन्ही को शब्दों का रूप दे दिया है.

बात करते हैं हम बदलाव की.
किसी ‘नए’, ‘करिश्माई नेता’ के चुनाव की.
जो इस पुराने, जंग खाते भारत में एक जान फूंके,
देश की जनता की सुषुप्त मानसिकता में प्राण फूंके.
वर्षों की लड़ाई व त्याग के बाद
किया हमने राजतंत्र से लोकतंत्र में प्रवेश.
हर पांच वर्ष में किया जाता है
सरकार द्वारा धन, और जनता द्वारा अपने वोट का
चुनावों में निवेश.
सिर्फ इसलिए कि देश को
एक सबल और नि:स्वार्थ नेतृत्व मिले.
बोस, पटेल और शास्त्री जैसा,
एक और व्यक्तित्व मिले.
देश की जनता का हो उस पर विश्वास.
केवल देशहित में हो जिसका प्रयास.

पर आज स्थिति भिन्न है.
स्वतंत्रता के पचास वर्ष बाद भी
उस स्थान पर केवल एक शून्य है.
पार्टियां बढ़ी हैं और नेता घटे हैं,
देश के विकास कार्यक्रम आज घोटालों से पटे हैं.
पंचवर्षीय योजनाएं हर बार करतीं हैं,
अपने लक्ष्य को छूने का एक असफल भागीरथ प्रयास.
बढ़ती मुद्रास्फीति, राजकोशीय घाटा, कर्ज व गरीबी
करते हैं विश्व के समक्ष, हमारे देश का उपहास.
और योजनाएँ करती हैं,
देश के बदले, हमारे तथाकथित नेताओं का विकास.
देश व देश की जनता का धन या तो स्विस बैंक में जाता है
या कभी-कभी शेयर, यूरिया और बोफोर्स जैसे
कुछ घोटालों में नज़र आ जाता है.
पर शायद ही वह हमारे देश के काम आ पाता है.

वोट की राजनीति, सत्तालोभ व स्वार्थ,
आज हर जगह है व्याप्त.
शायद नेताओं का युग ही हो गया है समाप्त.
आज के मेम्बर ऑफ पार्लियामेंट
डाकू, बिजनेसमैन और हिस्ट्रीशीटर हैं.
अंगूठाछाप, चापलूस और गैंगस्टर
देश के फ्यूचर लीडर हैं.
दलबदल, रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार
आज की राजनीति का धर्म है
आज के नेता का यही नैतिक कर्म है,

आज लंबी बहसें व चर्चाएँ होती हैं.
देश का सच्चा नेता कौन हो, इस पर
रैलियां, गोष्ठियां व सभायें होती हैं.
लीड इंडिया जैसे रिअलिटी शोज़ होते हैं
नेता बनने की युवकों मे होड़ होती है
पर जब नेता चुना जाता है
वो अपना असली रंग दिखता है!

संसद में सत्तारूढ़ पार्टी पर
अपोजिशन करता है प्रश्नों व आरोपों की बौछार.
लीडर ऑफ अपोजिशन, मंत्रियों पर
प्रश्नों, पेपरवेटों व माइकों का करता है वार.
उत्तर में शब्दों के साथ पेपरवेट व माइक ही आते हैं.
इस साहसिक युद्ध को, हम घर बैठे
टेलीविज़न पर देख घबराते हैं
और अपने पिछले निर्णय पर आठ-आठ आँसू बहाते हैं.

पुनः आते हैं चुनाव.
और हमें मिलता है नए नेता के चुनाव का अधिकार.
मतदान के लिए हम फिर करते हैं खुद को तैयार.
किसको चुने, किसको न चुने
इस चिर प्रश्न पर एक बार फिर करते हैं विचार.
एक बार फिर हम खुद को समझाते हैं.
और बूथकैप्चारिंग के डर को मन से भगाते हैं.
अंततः इस उहापोह में, हम जुआ खेल देते हैं.
और आँख बंद कर विभिन्न पार्टियों में से
किसी एक को अपना वोट दे देते हैं.
और हमारा नेता चुनने का अधिकार
हम फिर उन “पार्टियों” को ही दे देते हैं!

(गुलज़ार द्वारा निर्देशित फिल्म “हु तु तु ” से प्रेरित)

3 comments:

  1. इस सुंदर पोस्ट के लिए साधुवाद

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  2. अच्छा लिखा है असीम

    और इसी बहाने अंकल को किताब की शुभकामना…जल्द ही इसे हासिल करके पढ़ूंगा

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  3. बहुत अच्छा लिखा है आपने।

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