Monday, December 31, 2012

नव वर्ष मंगलमय हो !!

भेड़िये रहें जंगलों में ही,


इतना गोश्त और खून मिलता रहे उन्हें कि

आदमखोर न बनने पायें,

और शहरों में शिकार पर न निकलें

वातावरण निर्भय हो !!

नव वर्ष मंगलमय हो!!

प्रेम और करुणा “धर्म ग्रंथों” तक ही न रहें सीमित

वासना और पाशविकता, पशु की ही पहचान रहें

मानव, मानव ही रहे,

नारी को नर का न भय हो,

नव वर्ष मंगलमय हो!!

Sunday, May 6, 2012

उसे ख़ुदकुशी करना नहीं आता था!

सुबकती हुई सुबह, देहरी पर जा बैठी एक चिड़िया सूख चुके थे, उसके आंसू लुट चुका था, उसका घोंसला उसके नन्हे अंश हो चुके थे अब गिद्धों के हवाले! उड़ना पड़ा उसे, उसे ख़ुदकुशी करना नहीं आता था !

Sunday, December 11, 2011

समाधान

ब्लॉग का नाम "उलझन" से बदल कर "समाधान" कर दिया है..उसका कारण

परसों मुझे एक संभ्रांत व्यक्ति ने सलाह दी,कि
अपनी उलझन को सुलझाईये
तथा समाधान कि  तरफ कदम बढाइये.
मुझे उनकी बात पसंद आई
मैंने अपने अंदर झाँका और खुद को टटोला
अंदर से कुछ ध्वनि सुनाई पड़ी,
बड़ी ही मधुर, बड़ी ही शीतल
एक ऐसी झील की तरह,
जिसके किनारे बैठ, उठने का मन नहीं होता
मन होता है बस, झील के बहते जल की शाश्वतता के दर्शन करता रहूँ
एक ऐसे बाग की तरह,
जिसके फूलों की सुगंध
दिल, सदा-सदा के लिए खुद में बसा लेना चाहता है.
एक ऐसे पहाड़ कि तरह
जिसका शिखर आसमान से भी ऊँचा है.
और जहाँ पहुँच कर लेश मात्र भी भय नहीं लगता
ऐसे नारी कि तरह,
जिसकी सुंदरता शब्दों में बयां नहीं हो सकती

"उलझन" का "समाधान" मिलता नज़र आ रहा है,

"समाधान" भी तलाशता है कोई ?
"समाधान" तो है ही, फिर "तलाश" कैसी?
कहीं "समाधान" के होने पर भरोसा, कम तो नहीं?
या कहीं "उलझन" तो नहीं इतनी  कि
समाधान सामने नहीं आ रहा?
कैसे सुलझेगी यह 'उलझन'
कैसे गिरहें खुलेंगी,
कसे आएगा 'समाधान'
कहाँ तलाश करूँ उसको?
मैं बाहर भटकता, भटकता थक गया हूँ,
कहीं वो भीतर ही तो नहीं?
झलक तो दिखती है 'उसकी' कभी कभी
"ध्रुव तारे" जैसे वो नज़र आ  जाता है
पर दृष्टि उस पर टिक ही नहीं पाती
ध्रुव होने के बावजूद वो नज़रों से ओझल हो जाता है

'ध्रुव तारा'  बनने कि चाह है मुझमे
सदा अटल, सदा शीतल, सदा स्थिर - ध्रुव 
अपरिवर्तनशील, शाश्वत, नित्य
जहाँ समाधन ही समाधान है,
किसी तरह कि उलझन का नामोनिशान नहीं है

पर "समाधान" की तलाश का "सफर" भी कम मजेदार नहीं!

११-१२-२०११, नॉएडा

Monday, November 28, 2011

कुछ लिखना चाह रहा हूँ

कुछ लिखना चाह रहा हूँ
पर न जाने क्यूँ, विचार आकार नहीं ले रहे.
कभी अन्ना याद आ जाते हैं, कभी केजरीवाल और किरणबेदी
कभी दिग्विजय, कभी अग्निवेश और रामदेव
कभी अडवाणी की रथ यात्रा, मोदी और नितीश
कभी राहुल और कभी मायावती, मानसपटल पर कौंधते हैं.
कुछ लिखना चाह रहा हूँ
पर न जाने क्यूँ, विचार आकार नहीं ले रहे...



Saturday, April 9, 2011

इन्साफ अभी बाकी है !


ये तो अभी शुरुआत है,

अंजाम अभी बाकी है.

उम्मीदों और सपनों का परवान अभी बाकी है,

देखना ये उबाल ठंडा कहीं न पड़ जाये.

क्रांति का असली इम्तिहान अभी बाकी है

मुश्किल है रास्ता, दूर तलक चलना है,

इस सफर का मकाम अभी बाकी है,

जश्न मनाने का नहीं है ये समय,

एक आम चेहरे पर मुस्कान अभी बाकी है

रुक न जाना, थक न जाना,

लड़ रहे तमाम साथयों का इन्साफ अभी बाकी है.

जोश के साथ रखो होश बरकरार,

इस व्यवस्था को बदलने का काम अभी बाकी है