Monday, January 13, 2020

ज़िंदगी का सफर

सफर ज़िंदगी का
कब पूरा होगा पता नहीं,
पर चलते रहने का मज़ा  ही कुछ और है 

Monday, December 31, 2012

नव वर्ष मंगलमय हो !!

भेड़िये रहें जंगलों में ही,


इतना गोश्त और खून मिलता रहे उन्हें कि

आदमखोर न बनने पायें,

और शहरों में शिकार पर न निकलें

वातावरण निर्भय हो !!

नव वर्ष मंगलमय हो!!

प्रेम और करुणा “धर्म ग्रंथों” तक ही न रहें सीमित

वासना और पाशविकता, पशु की ही पहचान रहें

मानव, मानव ही रहे,

नारी को नर का न भय हो,

नव वर्ष मंगलमय हो!!

Sunday, May 6, 2012

उसे ख़ुदकुशी करना नहीं आता था!

सुबकती हुई सुबह, देहरी पर जा बैठी एक चिड़िया सूख चुके थे, उसके आंसू लुट चुका था, उसका घोंसला उसके नन्हे अंश हो चुके थे अब गिद्धों के हवाले! उड़ना पड़ा उसे, उसे ख़ुदकुशी करना नहीं आता था !

Sunday, December 11, 2011

समाधान की तलाश का सफर

ब्लॉग का नाम "उलझन" से बदल कर "समाधान" कर दिया है..उसका कारण

परसों मुझे एक संभ्रांत व्यक्ति ने सलाह दी,कि
अपनी उलझन को सुलझाईये
तथा समाधान कि  तरफ कदम बढाइये.
मुझे उनकी बात पसंद आई
मैंने अपने अंदर झाँका और खुद को टटोला
अंदर से कुछ ध्वनि सुनाई पड़ी,
बड़ी ही मधुर, बड़ी ही शीतल
एक ऐसी झील की तरह,
जिसके किनारे बैठ, उठने का मन नहीं होता
मन होता है बस, झील के बहते जल की शाश्वतता के दर्शन करता रहूँ
एक ऐसे बाग की तरह,
जिसके फूलों की सुगंध
दिल, सदा-सदा के लिए खुद में बसा लेना चाहता है.
एक ऐसे पहाड़ कि तरह
जिसका शिखर आसमान से भी ऊँचा है.
और जहाँ पहुँच कर लेश मात्र भी भय नहीं लगता
ऐसे नारी कि तरह,
जिसकी सुंदरता शब्दों में बयां नहीं हो सकती

"उलझन" का "समाधान" मिलता नज़र आ रहा है,

"समाधान" भी तलाशता है कोई ?
"समाधान" तो है ही, फिर "तलाश" कैसी?
कहीं "समाधान" के होने पर भरोसा, कम तो नहीं?
या कहीं "उलझन" तो नहीं इतनी  कि
समाधान सामने नहीं आ रहा?
कैसे सुलझेगी यह 'उलझन'
कैसे गिरहें खुलेंगी,
कसे आएगा 'समाधान'
कहाँ तलाश करूँ उसको?
मैं बाहर भटकता, भटकता थक गया हूँ,
कहीं वो भीतर ही तो नहीं?
झलक तो दिखती है 'उसकी' कभी कभी
"ध्रुव तारे" जैसे वो नज़र आ  जाता है
पर दृष्टि उस पर टिक ही नहीं पाती
ध्रुव होने के बावजूद वो नज़रों से ओझल हो जाता है

'ध्रुव तारा'  बनने कि चाह है मुझमे
सदा अटल, सदा शीतल, सदा स्थिर - ध्रुव 
अपरिवर्तनशील, शाश्वत, नित्य
जहाँ समाधन ही समाधान है,
किसी तरह कि उलझन का नामोनिशान नहीं है

पर "समाधान" की तलाश का "सफर" भी कम मजेदार नहीं!

११-१२-२०११, नॉएडा

Monday, November 28, 2011

कुछ लिखना चाह रहा हूँ

कुछ लिखना चाह रहा हूँ
पर न जाने क्यूँ, विचार आकार नहीं ले रहे.
कभी अन्ना याद आ जाते हैं, कभी केजरीवाल और किरणबेदी
कभी दिग्विजय, कभी अग्निवेश और रामदेव
कभी अडवाणी की रथ यात्रा, मोदी और नितीश
कभी राहुल और कभी मायावती, मानसपटल पर कौंधते हैं.
कुछ लिखना चाह रहा हूँ
पर न जाने क्यूँ, विचार आकार नहीं ले रहे...



Saturday, April 9, 2011

इन्साफ अभी बाकी है !


ये तो अभी शुरुआत है,

अंजाम अभी बाकी है.

उम्मीदों और सपनों का परवान अभी बाकी है,

देखना ये उबाल ठंडा कहीं न पड़ जाये.

क्रांति का असली इम्तिहान अभी बाकी है

मुश्किल है रास्ता, दूर तलक चलना है,

इस सफर का मकाम अभी बाकी है,

जश्न मनाने का नहीं है ये समय,

एक आम चेहरे पर मुस्कान अभी बाकी है

रुक न जाना, थक न जाना,

लड़ रहे तमाम साथयों का इन्साफ अभी बाकी है.

जोश के साथ रखो होश बरकरार,

इस व्यवस्था को बदलने का काम अभी बाकी है

Saturday, February 26, 2011

केंचुआ


मुड़ा हुआ तकिया, निकली हुई रुई,

गिरा हुआ गिलास, बिखरा हुआ पानी.

किताब, तौलिया, तेल की शीशी,

और कंघी के पास उलटी पड़ी चप्पल.

बगल में बैठा एक लड़का,

खिडकी से बाहर देख रहा,

कमर में रस्सी बांधे, ताड़ पर चढ़ते आदमी को,

गाड़ी से बाहर झांकते, झीभ लपलपाते कुत्ते को,

नाली में बहते नोट को,

और गीली मिटटी में रेंगते केंचुए को.

Wednesday, February 2, 2011

क्यूंकि वक्त बदलेगा


बहुमंजिली अट्टालिका के पास, एक बेड रूम फ्लैट में,

सुबह बेटे को सरकारी स्कूल में भेजते हुए,

जो कार वालों के स्कूल के सामने है.

पत्नी की ५ साल पुरानी साडी को देख कर,

नौकरी के लिए दौड कर बस पकड़ते हुए,

और महीने के बीच में अपनी जेब टटोलते हुए,

जिंदा रखो अपने सपनो को,

क्यूंकि वक्त बदलेगा.


मकान के लिए लोन लेते हुए,

महँगी सब्जी और सस्ता मोबाइल खरीदते हुए,

घिसे हुए जूते पहन कर, मॉल में घुमते हुए,

और टी वी पर कामेडी शो देखते हुए,

जिंदा रखो अपने सपनो को,

क्यूंकि वक्त बदलेगा.


ट्रेन के सेकेण्ड क्लास में सफर करते हुए,

टूटी सड़क और गड्ढों के बीच स्कूटर से चलते हुए,

बेटी के विवाह के लिए दहेज देते हुए,

और अपना बिजली का मीटर ठीक कराने के लिए लाइनमैन को रिश्वत देते हुए,

जिंदा रखो अपने सपनो को,

क्यूंकि वक्त बदलेगा.


अखबार में रोज घोटालों और भ्रष्टाचार की ख़बरें पढते हुए,

नेताओं को संसद में युद्ध करते देखते हुए,

एक बड़े बाप के बलात्कारी बेटे को पेरोल पर छूटते देखते हुए,

एक और आतंकवादी हमले के बाद भी,

जिंदा रखो अपने सपनो को,

क्यूंकि वक्त बदलेगा!


क्यूंकि अंग सांग सु की की रिहाई हो गयी है,

क्यूंकि ट्यूनीशिया की ‘जास्मिन क्रांति’ सफल हो गयी है,

क्यूंकि मिस्र के ‘तहरीर चौक’ पर जनसैलाब उमड पड़ा है,

क्यूंकि जार्डन में सरकार बर्खास्त हो गयी है,

क्यूंकि तासीर की हत्या का दर्द सिर्फ पकिस्तान तक सीमित नहीं है,

क्यूंकि भारत में भी कुछ सच्ची आवाजें बुलंद हैं,

क्यूंकि लोकतंत्र, साम्यवाद और समाजवाद अब बच्चे नहीं रहे,

जवान हो रहे हैं.

Tuesday, January 18, 2011

ख़बरें















चाय की चुस्की लेते हुए अखबार पर नज़र गयी,

एक गाड़ी पर एक फ्री, ब्रांडेड!, शीर्षक समाचार.

उसके बाद, क्रिकेट.

भारत की कल की जीत की खबर मोटे टाईप में बीच में थी,

आधे पेज की विजय गाथा के बाद नीचे कुछ छोटी ख़बरें थीं.

औद्योगिक विकास दर तेज ,प्याज साठ रुपये किलो.

भारत के एक बड़े औद्योगिक समूह ने एक विदेशी कंपनी को खरीदा,

प्रवासी भारतीय दिवस पर भारत ने प्रवासियों से निवेश की गुहार लगायी,

नक्सलियों ने दस की नृशंस ह्त्या की, एक नक्सल विचारधारा का नेता गिरफ्तार.

प्रधानमंत्री ने घोषित की एक नयी ग्रामीण एवं कृषि विकास योजना.

छोड़ दिया जीना, चार और किसानो ने थक कर .

एक और रूट आरम्भ दिल्ली मेट्रो का, दो राज्यों में भी मेट्रो शुरू करने के मांग.

सड़क के गड्ढे में एक स्कूल बस उलटी और एक फ्लाईओवर गिरा- शुक्र है सब बच गए.

निर्माण कार्य ज़ोरों पर, मजदूरों की जबरदस्त खपत

अब मजदूरों का आयात होगा कुछ देशों से, समझौते के तहत.

कुछ आम ख़बरें :

मलेरिया, एड्स और ब्लू लाइन से कुछ लोग मरे. पिछले हफ्ते

कुछ तीस एक लोग और मारे गए, कुछ हमारे यहाँ और कुछ उधर.

कुछ ख़बरें, हाशिए पर:

कुछ पुराने घोटालों पर ताज़ी अपडेट!

दो जवान और एक लड़की शहीद हुए, रिपोर्ट के अनुसार.

पहला पन्ना खत्म हो गया, अचानक

बाकी पन्ने इन्ही ख़बरों का विस्तार हैं.

Wednesday, December 29, 2010

नया साल

फिर आ गया एक नया साल,

पिछले तमाम सालों की तरह,

अपनी वही ‘पुरानी जिंदगी’ बिताने के लिए

हम सबका रचा, एक ‘नया साल’

नई खोजों, नए प्रयासों का साल,

नए तरीके से पैसा कमाने का साल,

झूठ बोलने का, पाप करने का साल,

नौकरी, शादी, तलाक का साल,

बच्चे पैदा करने का साल,

जीने का साल,

मरने का साल,

फिर से खुद को भूल जाने का साल,

नया साल,


फिर चलेगा, पुरानी घटनाओं पर,

समीक्षाओ और चर्चाओं का दौर,

फिर हम अपनी उपलब्धियां गिनाएंगे,

दोषों और कमियों को बिसरायेंगे ,

गुजरे साले ने हमें कैसे गुजारा,

एक दुसरे को सुनायेंगे,

नए साल पर नए वादे करेंगे,

कुछ दिनों के लिए फिर कसमें खायेंगे,

पिछली बातों को,

पुराने वादों और पुरानी कसमों को,

सच को,

एक बार फिर से भूल जायेंगे,

नए सिरे से फिर वही सब दुहराएंगे,

और अगले साल,

फिर ‘एक नया’ साल मनाएंगे.

Monday, December 20, 2010

पटकथा





















उसके आंसू ढलक गये चुपचाप,

पसीने की धार में छुपकर.

वे शब्द उसके कान में पड़ रहे थे और जवाब आँखें दे रही थी,

कह तो यूं ही रही थी वह कुछ… पता नहीं क्या

उसे फिर लगा एक बार कि बस औरत है वह एक.

इंसान होना कुछ और होता है शायद


दो आदमियों और एक औरत, का सामना कर रही थी वो,

एक उसका, जिसके साथ उसने अपना अस्तित्व जोड़ दिया था,

एक उसका,  जो पिता था पर अपने बेटों का,

और एक उसका, जो समय के साथ खो चुकी है अपना अस्तित्व

एक रिश्ते को छोड़ आई थी वह एक नए रिश्ते के लिए

यह पहली बार नहीं हुआ उसके साथ,

हज़ार बरसों से होता आ रहा है.


शुक्र है यह सब हो रहा था टीवी के रुपहले पर्दे पर

और ख़त्म हो गया कुछ घंटों में ही

सब उस धारावाहिक की कहानी में खो गए,

उसने ठंडी सांस ली.

हर किरदार ने बख़ूबी निभाई थी अपनी भूमिका,

उसे लगा कि उसी ने लिखी है यह पटकथा जिसने लिखी उसकी ज़िन्दगी की

अब वो पूजा नहीं करती.

धारावाहिक देखती है,

Monday, December 6, 2010

कंप्यूटर






















इकीसवीं सदी.

बीस-पच्चीस साल का युवक.

आँखों में आंसू,

चेहरे पर तनाव, दिल में कुछ अनकहे जज़्बात.

उसकी उँगलियों का दबाव कंप्यूटर स्क्रीन पर ,

एक-से हरफों में एक एक कर उभर रहा है.

वो दिल की धडकन कंप्यूटर पर ‘टाइप’ करने की कोशिश कर रहा है,

और तार के ज़रिये दूसरे कंप्यूटर स्क्रीन तक पहुँचाना चाह रहा है.

उन काले, रेगुलर, टाईम्स न्यू रोमन, १० फाँट के शब्दों में संजीदगी डाल रहा है.

उम्मीद है उसे की उसके ख़याल, उसके जज़्बात, उसकी महक और उसकी सांस भी

शायद पहुँच रही दूर कहीं, दूसरी स्क्रीन पर, ‘एक अजनबी, अनदेखे’ चेहरे तक.


वो आस्तिक है.

उसे अनदेखे, अनजाने भगवान में यकीन है,

उसे उसका भगवान एक दिन मिलेगा?

शायद वो कंप्यूटर स्क्रीन से ही निकल आये,

आखिर भगवान तो हर जगह व्याप्त है.!

Sunday, November 14, 2010

वसु





















(मेरा भांजा 'वसु')


वो भाग रहे वो कूद रहे

वो गिर रहे फिर उठ रहे,

नटखट, चंचल और शैतान,

हैं बिल्कुल एक खरगोश समान,

ये हैं हमारे वसु श्रीमान,


सुबह से शाम तक सबको हिला देते हैं,

चैन ले लेते हैं और नींद चुरा लेते हैं,

कर देते हैं नाक में दम,

जब अपनी पे आ जाएँ तो नहीं किसी जिन्न से कम,

इनकी करतूतों के हैं किस्से तमाम,

ये हैं हमारे वसु श्रीमान,


मम्मी-पापा को कर देते हैं भयभीत,

डांटने पर निकाल देते हैं संगीत,

जो मना करो बस वही करते हैं,

इनकी खुराफातों से सभी डरते हैं,

इनको दूध पिलाना है एक युद्ध समान,

ये हैं हमारे वसु श्रीमान,


पर हैं बड़े ही प्यारे,

‘कृष्ण समान’, सबके दुलारे,

पापा-मम्मी के आँखों के तारे,

नाना-नानी को लगते हैं न्यारे,

मामा-मामी भी हैं इनके फैन,

ऐसे हैं भई वसु हमारे.

Friday, November 12, 2010

गुन्नू

मेरी प्यारी भांजी गुनगुन उर्फ 'गुन्नू' ..उसके लिए इन पंक्तियों को लिखने से अपने आप को रोक नहीं पाया..






















हँसती गाती मौज मनाती,

खेल खेल में बढती जाती,

वक्त के साथ हाथ मिलाती,

नित नए है पाठ पढाती,

सबकी प्यारी गुन्नू.


कथक पे है पैर थिरकाती,

पिआनो पर भाई का साथ निभाती,

टेनिस के खेल में रंग जमाती,

कहानियाँ पढ़ती तो पढ़ती ही जाती,

रात को सुनती और सुनाती,

सबकी प्यारी गुन्नू.


पापा के है पैर दबाती,

मम्मी का है सर सहलाती,

नाना को घोडा बनवाती,

नानी को घर भर दौड़ाती,

सबकी प्यारी गुन्नू.


क्लास में सबको दोस्त बनाती,

पढ़ाई में हमेशा अव्वल आती,

होमवर्क को सदा कर जाती,

टीचर से वेरी गुड पाती,

सबकी प्यारी गुन्नू.


मामा-मामी से प्यार जताती,

जब भी आयें गले लगाती,

हाथ पकड़ के सैर कराती,

कंधे पर चढ़ चक्कर लगवाती,

सबकी प्यारी गुन्नू.


गुन्नू सबकी प्यारी है.

घर भर की दुलारी है,

आगे बढती जायेगी,

खूब नाम कमाएगी.

Saturday, November 6, 2010

सिहरन

मैं गाड़ी में बैठा सिग्नल हरा होने का इंतज़ार कर रहा था,

तभी खिडकी के शीशे पर ठकठकाने के आवाज हुई,

और सिहरती हुई, हाथ जोड़े, दो पथराई आँखे दिखीं,

मैं शीशा नहीं खोल पाया,

पर पता नहीं कैसे हवा का एक ठंडा झोंका भीतर आ गया, जबरन.

बदन में एक पुरानी सी सिहरन, पैदा कर गया,

और मुझे कुछ बीस साल पहले घसीट ले गया,

जनवरी के महीने में,

जब मैं दो दो स्वेटर पहन कर, टोपी और मफलर लगा कर,

सयकिल से ट्यूशन पढ़ने जाता था,

और नाले पर रोज निक्कर पहने एक लड़का दीखता था,

लगभग मेरी ही उम्र का,

कांपते हुए, और, ठंडी राख तापते हुए,

मेरी तरफ देख के मुस्कुराता था,

पर मैं मुस्कुरा नहीं पाता था,

डर सा जाता था.

आज गाड़ी के अंदर, ऐ सी में बैठ कर,

मुझे, वैसा ही डर लग रहा है,

आज वो लड़का  मुस्कुरा नहीं रहा है,

Friday, October 29, 2010

ये एक नई सुबह है















हरे पत्तों पर ठंडी ओस की बूँद,

चिड़ियों की चहचाहट की गूँज,

और ठंडी ठंडी धीमी बयार,

हमसे कुछ कहते हैं यार,

ये एक नई सुबह है!


दादा जी का मॉर्निग वाक, अपनी पोती के साथ,

उस घर से आती छोटे बच्चे की आवाज़,

अँधेरे को चीरता ये उजास,

कराता है हमे ये एहसास,

ये एक नई सुबह है!


आँखों में कुछ सपनों की आस,

आलस्य को हराता नव-उल्लास,

हर पल बढ़ता ये प्रकाश,

मन को दिलाता यह विश्वास,

ये एक नई सुबह है!

Sunday, October 17, 2010

आज माँ ने दुर्गा का रूप लिया है





















एक भीमकाय आकृति गिर रही है पृथ्वी पर,

रक्तरंजित शरीर, छिन्नभिन्न है अहंकार,

आहत है विकराल दानव,

राग-द्वेष-मोह, तीन सर उसके,

कट रहे हैं एक एक कर,

पराजित हो गया है वह ‘शक्ति’ से,

मर्दन हो गया है उसके अस्तित्व का,

बड़ी बड़ी आँखें, बिखरे बाल,

भुजाओं में अस्त्र, जिह्वा है लाल,

प्रचंड है आकार, प्रबल है प्रहार,

महिषासुरमर्दिनी हो तेरी जय,

तम पर हो सदा सत्य की विजय,

आज तुने ‘दुर्गा’ का रूप लिया है,

किया है रक्त पान,

इस दूषित रक्त को अब तू अमृत में बदल,

जिसकी एक बूँद आज सबको मिले,

और तेरा अंश हो सबमें व्याप्त,

हम सब करें पराजित तेरी शक्ति से,

अपने अपने अंदर छिपे दानवों को,

और करें जय अपने मन पर,

माँ तू अब सदा हममें वास कर..

Thursday, October 14, 2010

शुक्रिया मुझे जन्म देने का.!
















मुझे पता हैं उठा लोगे तुम,

इसलिए मैं गिरने से नहीं डरती.

तुम्हारी हंसी से मेरे आंसू हंसी में बदल जाते हैं,

एक साहस सा पनप आता है तुम्हे देख के,

मेरी हार जीत में बदलेगी, ये तुम्हे मालूम है

...इसलिए मैं हारने से नहीं डरती,

गिरती हूँ, फिर सम्हालती हूँ, कोशिश करती हूँ,

तुम्हारी आँख की चमक मेरी आँखो की चमक में बदल जाती है,

हवा में जब तुम मुझे उछालते हो, पता है मैं तुम्हारे हाथों में गिरूंगी,

इसलिए अपने आप को तुम्हारे हवाले कर देती हूँ,

सुरक्षित रहती हूँ कुछ समय तक, तुम्हारे पास,

तब तक, जब तक मैं  'दूसरे के हवाले' नहीं हो जाती,

तब तुम्हारी आँखों के आंसू सदा के लिए मेरी आँखों में बस जाते हैं,

मैं कुछ भी कर सकती हूँ, कुछ भी बन सकती हूँ,

जन्म दे सकती हूँ एक उद्धारक को,

अगर खुद जन्म ले सकूं तो..!!


शुक्रिया मुझे जन्म देने का.!

Saturday, October 9, 2010

तिनके से ख़याल





















घास के तिनके से उड़ते जा रहे हैं कुछ ख़याल,

कभी खेत में गिरते, कभी पेड पे हैं टिकते,

कभी गौरैया के घोंसले बनते, कभी लंबे बालों में जा उलझते,

कभी किताब के पन्ने पढते, कभी चूल्हे में जलते,

इतने हलके, इतने महीन, हर कहीं जा पहुँचते,

जब ये गीली मिट्टी पे गिरेंगे, जमेंगे और उगेंगे

सांस लेंगे, धूप में अपनी खुराक लेंगे,

फिर ये तिनका नहीं रहेंगे, बढ़ेंगे और पेड हो जायेंगे

फूलेंगे, फलेंगे और फिर एक तिनके को जन्म देंगे.

और एक नया पेड़ बन जाएंगे ,

खिलेंगे, खिलखिलाएंगे, लहलहायेंगे!

Thursday, September 30, 2010

तीन बेटे एक माँ के

झगड़ रहे थे तीन बेटे एक माँ के


सोने को माँ के पास, उसकी गोद में, एक ही जगह

काफी समझाने पर भी नहीं समझे,

फिर माँ ने फैसला सुनाया.

तीनो को अगल बगल सुलाया,

और एक-एक कर तीनो को सीने से लगाया.



आज सुप्रीम कोर्ट ने भी वैसा ही फैसला सुनाया है

आयें झगड़ा सदा के लिए खत्म करें

और एक दूसरे से प्रेम करें